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पाठ 2 पतंग (आलोक धन्वा) 12th हिंदी (आरोह भाग 2 काव्य खंड) | कविता का भावार्थ व सारांश एवं संपूर्ण अभ्यास (प्रश्न उत्तर)

  • BY:
     RF Tembhre
  • Posted on:
    May 16, 2025

भाव सारांश-

'पतंग' नामक कविता के रचयिता 'आलोक धन्वा' हैं। यह एक लम्बी कविता है जिसके तीसरे भाग को पाठ्य-पुस्तक में संकलित किया गया है। पतंग के बहाने इस कविता में बालसुलभ इच्छाओं एवं उमंगों का सुन्दर चित्रण किया गया है।

गम्भीर काव्य के चितेरे कवि आलोक धन्वा ने संकलित कविता 'पतंग' में बाल क्रियाकलापों एवं प्रकृति में आए परिवर्तन को अभिव्यक्त करने के लिए सुन्दर बिम्बों का उपयोग किया है। कवि कहता है कि बरसात के मौसम भादों के बाद अब शरद ऋतु आ चुकी है। ऐसे में पतंग उड़ाने को आतुर बच्चों को प्रकृति की ओर से खुला निमन्त्रण मिल चुका है। वे सभी झुण्ड में पतंगबाजी के लिए घर की छतों, मुडेरों एवं कंगूरों पर एकत्रित हो चुके हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर वे ऐसे फुदकते हैं मानो कपास के भारहीन रूएँ हों। उनके पैर छतों पर ऐसे दौड़ते हैं मानो वे कठोर छत नहीं अपितु नर्म धरातल वाली कोई जगह हो। मौसम की तान पर मृदंग के राग छेड़ते ये नन्हें पतंगबाज छतों के किनारों पर भी सरपट दौड़ लगाते हैं। कभी-कभी वे गिरने की कगार पर होते हैं, ऐसे में स्वयं ही सँभलते आगे बढ़ते हैं मानो पतंगों की डोर न सिर्फ ऊपर आकाश में पतंग को बल्कि नीचे उन्हें थामे रहती हो। डोर थामे पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ते-फिरते हैं। छतों के किनारों से गिरते-गिरते यदि वे बच जाते हैं तो और भी निर्भीक होकर एक छत से दूसरी पर उछल-कूद करने लगते हैं।

कवि परिचय
आलोक धन्वा

जन्म- सन् 1948 ई. मुंगेर (बिहार)

प्रमुख रचनाएँ- पहली कविता जनता का आदमी, 1972 में प्रकाशित उसके बाद भागी हुई लड़कियाँ, खूनो की बेटियाँ से प्रसिद्धि, दुनिया रोज बनती है (एकमात्र संग्रह)

प्रमुख सम्मान- राहुल सम्मान, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का साहित्य सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, पहल सम्मान।

जहाँ नदियाँ समुद्र से मिलती हैं वहाँ मेरा क्या है मैं नहीं जानता लेकिन एक दिन जाना है उधर सातवें-आठवें दशक में कवि आलोक धन्वा ने बहुत छोटी अवस्था में अपनी गिनी-चुनी कविताओं से अपार लोकप्रियता अर्जित की। सन् 1972-1973 में प्रकाशित इनकी आरंभिक कविताएँ हिंदी के अनेक गंभीर काव्यप्रेमियों को जबानी याद रही हैं। आलोचकों का तो मानना है कि उनकी कविताओं ने हिंदी कवियों और कविताओं को कितना प्रभावित किया, इसका मूल्यांकन अभी ठीक से हुआ नहीं है। इतनी व्यापक ख्याति के बावजूद या शायद उसी की वजह से बनी हुई अपेक्षाओं के दबाव के चलते, आलोक धन्वा ने कभी थोक के भाव में लेखन नहीं किया। सन् 72 से लेखन आरंभ करने के बाद उनका पहला और अभी तक का एकमात्र काव्य संग्रह सन् 98 में प्रकाशित हुआ। काव्य संग्रह के अलावा वे पिछले दो दशकों से देश के विभिन्न हिस्सों में सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने जमशेदपुर में अध्ययन-मंडलियों का संचालन किया और रंगकर्म तथा साहित्य पर कई राष्ट्रीय संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता के रूप में भागीदारी की है।

पाठ्यपुस्तक में ली गई कविता पतंग आलोक धन्वा के एकमात्र संग्रह का हिस्सा है। यह एक लंबी कविता है जिसके तीसरे भाग को पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया है। पतंग के बहाने इस कविता में बालसुलभ इच्छाओं एवं उमंगों का सुंदर चित्रण किया गया है। बाल क्रियाकलापों एवं प्रकृति में आए परिवर्तन को अभिव्यक्त करने के लिए सुंदर बिंबों का उपयोग किया गया है। पतंग बच्चों की उमंगों का रंग-बिरंगा सपना है। आसमान में उड़ती हुई पतंग ऊँचाइयों की वे हदें हैं, बालमन जिन्हें छूना चाहता है और उसके पार जाना चाहता है।

कविता धीरे-धीरे बिंबों की एक ऐसी नयी दुनिया में ले जाती है जहाँ शरद ऋतु का चमकीला इशारा है, जहाँ तितलियों की रंगीन दुनिया है, दिशाओं के मृदंग बजते हैं। जहाँ छतों के खतरनाक कोने से गिरने का भय है तो दूसरी ओर भय पर विजय पाते बच्चे हैं जो गिर-गिरकर सँभलते हैं और पृथ्वी का हर कोना खुद-ब-खुद उनके पास आ जाता है। वे हर बार नयी-नयी पतंगों को सबसे ऊँचा उड़ाने का हौसला लिए फिर-फिर भादो (अँधेरे) के बाद के शरद (उजाला) की प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्या आप भी उनके साथ हैं?

पदों के प्रसंग संदर्भ सहित व्याख्या

(1) सबसे तेज बौछारें गर्मी भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके-
दुनिया की सबसे हल्की और रंगीन चीज उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला कागज उड़ सके -
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके -
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाजुक दुनिया

संदर्भ― प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'आरोह' के 'पतंग' नामक पाठ से अवतरित है। इसके रचयिता 'आलोक धन्वा' हैं।
प्रसंग - प्रस्तुत गद्य-कवितांश में कवि ने प्रकृति एवं मौसम में होने वाले परिवर्तनों एवं उनसे रोमांचित पतंग उड़ाने को उतावले बच्चों की उमंगों का सजीव चित्रण किया है।

व्याख्या- कवि कहता है कि मूसलाधार बारिश का महीना 'भादों' अब बीत चुका है। भादों महीने के अंधेरे के दिनों को उजास देने के लिए अद्भुत चमक और खरगोश की आँखों के रंग जैसी लालिमा लिए नया सूरज आकाश में निकल आया है। भादों माह के प्रस्थान के बाद शरद ऋतु एक ऊर्जावान चंचल बालक के समान अपनी नई चमकीली साइकिल पर सवार हो, खेतों-खलिहानों-पुलों को पार करती हुई दस्तक दे रही है। ऐसा लग रहा है मानो शरद ऋतु एक बालक के वेश में अपनी साइकिल की घंटी जोर-जोर से बजाते हुए पतंग उड़ाने को आतुर नन्हे पतंगबाजों को स्पष्ट संकेत दे रही है कि वे समूहों में आयें और पतंग की मस्ती में सराबोर हो जायें। उसने पतंगबाजी के अनुकूल आकाश के ऊपरी स्तर को हल्का (मुलायम) बना दिया है ताकि बच्चे सरलता से पतंगों को उड़ा सकें। वे पतंगें जो संसार की सबसे हल्की वस्तु हैं। वे पतंगें जो अपने आप में रंगों का एक अद्भुत आकर्षक संसार समेटे रहती हैं। शरद ऋतु के आगमन के साथ ही प्रकृति ने ऐसा वातावरण तैयार कर दिया है कि दुनिया का सबसे हल्का कागज उड़ सके। सबसे पतली और हल्की कमानी (खपच्ची) उड़ सके। ऐसा लगता है कि स्वयं प्रकृति उन नन्हे पतंगबाजों की सीटियों, खुशी और मस्ती की आवाजों को सुनने एवं तितली के समान एक स्थान से दूसरे स्थान तक उन्हें फुदकते-दौड़ते देखने के लिए आकुल-व्याकुल हो।

विशेष (काव्य सौंदर्य) ― (1) बाल-सुलभ चेष्टाओं का अद्भुत अनूठा सहज वर्णन है। (2) शरद ऋतु का मानवीकरण हुआ है। (3) एक साथ कई अलंकारों- मानवीकरण, अनुप्रास, पदमैत्री, उपमा, पुनरुक्तिप्रकाश, श्लेष आदि का सुन्दर प्रयोग हुआ है। (4) भाषा सरल, सहज, सरस खड़ी बोली है जो भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।

(2) पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंधों के सहारे
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज घूमती हुई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास।

संदर्भ― प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'आरोह' के 'पतंग' नामक पाठ से अवतरित है। इसके रचयिता 'आलोक धन्वा' हैं।
प्रसंग - प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बच्चों की बालसुलभ चेष्टाओं और खतरों से बचने पर उत्पन्न साहस का मनोहारी वर्णन किया है।

व्याख्या- कवि कहता है कि प्रकृति में हुए परिवर्तन से प्रसन्न बच्चे पतंग उड़ाते समय अत्यधिक रोमांचित दिखते हैं। ऐसा लगता है कि अपनी रंग-बिरंगी पतंगों के साथ-साथ वे भी अपने शरीर के असंख्य छिद्रों के बल पर असीम आकाश में उन्मुक्त उड़ान भर रहे हों। जब कभी वे छतों-मुंडेरों के खतरनाक किनारों से नीचे गिरने लगते हैं तो पतंग को सँभालने की ही भाँति दायें बायें होकर वे अपने शरीर को भी सँभालने का भरसक यत्न करते हैं। स्वयं पर नियन्त्रण के इस प्रयास में यदि वे नीचे गिरने से बच जाते हैं तो उनका उत्साह और जोश और भी बढ़ जाता है। अब वे निडर हो दुगुनी ऊर्जा के साथ चमकते सूरज की आँखों में आँखें डालकर फिर से पतंग उड़ाने लग जाते हैं। उनके पैरों की चपलता देखकर ऐसा लगता है मानो पृथ्वी और भी तीव्र गति से चलकर स्वयं उनके पैरों के नीचे आने को आतुर हो अर्थात् वे अपने पैरों से पृथ्वी का कोना-कोना छानने को तत्पर दिखते हैं।

विशेष (काव्य सौंदर्य) ― (1) बच्चों की बालसुलभ चेष्टाओं का सजीव चित्रण है। (2) लाक्षणिक भाषा का अत्यन्त मनोरम प्रयोग है। (3) 'साथ-साथ' में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। (4) पृथ्वी का मानवीकरण हुआ है। इससे उत्पन्न मानवीय अलंकार के कारण पद्यांश सजीव हो उठा है। (5) 'सुनहले सूरज' में अनुप्रास अलंकार है। (6) भाषा सरल, सहज, सरस एवं भावानुकूल है।

पाठ का अभ्यास

कविता के साथ

1. 'सबसे तेज बौछारें गयीं, भादों गया' के बाद प्रकृति में जो परिवर्तन कवि ने दिखाया है, उसका वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर - सबसे तेज बारिश वाला महीना बीत चुका है। साथ ही, काली-काली घटाओं वाला भादों मास भी चला गया है। प्रकृति परिवर्तन का आवरण ओढ़े अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ गई है। नई सुबह का चमकता-दमकता सूरज खरगोश की आँखों सरीखी लालिमा लिए हुए है। चारों ओर हरियाली छाई है। पेड़ों के पत्ते बारिश में धुलकर ऐसे लग रहे हैं मानो उन पर किसी ने हाल ही में हरा रंग कर दिया हो। पंछी कलरव कर रहे हैं। रंगीन तितलियाँ प्रकृति के अद्भुत सौन्दर्य को और बढ़ा रही हैं। फूलों पर भौरे भ्रमण कर रहे हैं। वातावरण में साँधी-सौंधी सुगन्ध फैली हुई है। मौसम का खुला निमन्त्रण पाकर बच्चे पतंगों की डोर थामे छतों पर पहुँच गये हैं। उनकी हर्ष मिश्रित आवाजें एवं सीटियाँ वातावरण में लयबद्ध संगीत का सा स्वर उत्पन्न कर रही हैं।

2. सोचकर बताएँ कि पतंग के लिए 'सबसे हलकी और रंगीन चीज', 'सबसे पतला कागज, सबसे पतली कमानी' जैसे विशेषणों का प्रयोग क्यों किया है ?
उत्तर - तेज बारिश में घरों में दुबके बैठे बच्चे मौसम के करवट लेने पर हाथों में रंग-बिरंगी पतंगों की डोर थामे छतों-मैदानों पर उमड़ पड़े हैं। ये बच्चे शरीर से छोटे, हल्के एवं स्वभाव से अत्यन्त कोमल हैं। प्रतीकों के माध्यम से कवि ने भी इस कविता में बच्चों की कपास-सरीखी कोमल एवं हल्की-फुल्की भावनाओं का मनोरम वर्णन किया है। सम्भवतः इसी कारण से कवि ने पतंग के लिए सबसे हल्की और रंगीन चीज, सबसे पतला कागज एवं सबसे पतली कमानी जैसे बाल-सम्मत विशेषणों का प्रयोग किया है।

3. बिम्ब स्पष्ट करें -

सबसे तेज बौछारें गयीं भादों गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज चलाते हुए
घंटी बजाते हुए जोर-जोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके।
उत्तर - प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने कई बिम्बों का मिश्रित प्रयोग किया है। यह बिम्ब योजना दृश्य गतिशील, जैसे- 'तेज बौछारें', 'पुलों को पार करते हुए', 'साइकिल तेज चलाते हुए', 'चमकीले इशारों से बुलाते हुए' आदि; दृश्य स्थिर, जैसे- 'सवेरा हुआ', 'खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा', 'पतंग ऊपर उठ सके' आदि; श्रव्य, जैसे- 'घंटी बजाते हुए जोर-जोर से' तथा स्पर्श, जैसे- 'आकाश को इतना मुलायम बनाते' जैसे बिम्ब से पूरित है।

4. 'जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास'- कपास के बारे में सोचें कि कपास से बच्चों का क्या सम्बन्ध बन सकता है।
उत्तर - बच्चे भी कपास (रुई) के समान हल्के-फुल्के, कोमल, मुलायम, उछल-कूद करने वाले तथा हल्की चोट को सहजता से सहन करने वाले होते हैं। उन्हें इधर-उधर विचरते देखकर ऐसा आभास होता है मानो उनके पैरों के तलवों में कपास (रुई) लगी हो जिससे न सिर्फ वे स्वयं सुरक्षित रहते हैं अपितु जिन छतों, मुंडेरों, किनारों पर वे दौड़ते-भागते हैं, वे भी उनके पैरों के तलवों के सम्पर्क में आने से कपास (रुई) की तरह मुलायम और गद्देदार हो जाते हैं। संभवतया इसी कारण से कवि ने बच्चों का कपास के साथ जन्म से सम्बन्ध बताया है।

5. 'पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं'- बच्चों का उड़ान से कैसा सम्बन्ध बनता है ?
उत्तर - वास्तव में पतंग बच्चों की कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सटीक प्रतीक हैं। जब बच्चे अनन्त आकाश में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगों को देखते हैं तो वे भी उन्हीं पतंगों की तरह खुले आसमान में उन्मुक्त उड़ान भरते हैं। पतंग उड़ाने को आतुर बच्चे इस काल्पनिक उड़ान के लिए मार्ग की बाधाओं अथवा सम्भावित खतरों से भी जूझने को तैयार रहते हैं। आसमान में तितलियों की तरह इधर-उधर हिलोरें लेती पतंगों को देखकर उनका मन भी आसमान की ऊँचाइयों को छूने के लिए उत्साहित रहता है। इसलिए, यह कहना ठीक ही है कि पतंगों के साथ-साथ बच्चे भी उड़ते हैं। दोनों की उड़ानों में अंतरंग सम्बन्ध है।

6. निम्नलिखित पंक्तियों को पढ़कर प्रश्नों का उत्तर दीजिए-
(क) छतों को भी नरम बनाते हुए दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए

(ख) अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं।

प्रश्न - (अ) दिशाओं को मृदंग की तरह बजाने का क्या तात्पर्य है ?
(ब) जब पतंग सामने हो तो छतों पर दौड़ते हुए क्या आपको छत कठोर लगती है ?
(स) खतरनाक परिस्थितियों का सामना करने के बाद आप दुनिया की चुनौतियों के सामने स्वयं को कैसा महसूस करते हैं ?

उत्तर - (अ) 'दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए' से तात्पर्य यह है कि जब बच्चे पतंग उड़ाने की प्रत्याशा में एक छत से दूसरी छत पर अपने नन्हें पैरों से कूदते-फाँदते दौड़ते हैं तो ऐसा लगता है कि उनके मुलायम एवं कोमल पैरों के सम्पर्क में आकर छतों का कठोर धरातल भी अत्यन्त कोमल हो गया है। वे अपनी ही तरंग में प्रत्येक दिशा में इस प्रकार कुलाँचे भरते हैं जैसे मानो कोई संगीत साधक इन दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए उनसे अद्भुत कर्णप्रिय संगीत निकाल रहा हो।
(ब) पतंगें बच्चों के बालसुलभ मन का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक हैं। जब पतंग सामने हो तो उन्हें सिर्फ वही दिखती है। पतंग पकड़ने की चाह में बच्चे आसमान की ओर ताकते हुए पतंग की ओर ऐसे भागते हैं मानो उनके सामने घरों की छतें व खतरनाक किनारे न होकर कोई सपाट मखमली मैदान हों। स्वाभाविक है कि पसन्द की चीज सामने होने पर उन्हें छतों का कठोर धरातल भी कोमल, मुलायम एवं गद्देदार ही लगता है।
(स) जीवन में कर्त्तव्य-पथ पर बढ़ते-बढ़ते कई बार मनुष्य के जीवन में ऐसी खतरनाक परिस्थितियाँ आती हैं जिनके चक्रव्यूह में फँसकर वह अक्सर बिखर जाता है। उसका आगे बढ़ने का हौंसला टूट जाता है। किन्तु यदि कोई इन खतरनाक परिस्थितियों का अपने कौशल एवं विवेक से सामना करे और सफलतापूर्वक उनसे पार पा जाये तो ऐसे में वह भविष्य की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने के लिए निडर हो जाता है।

कविता के आस - पास

1. आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को देखकर आपके मन में कैसे खयाल आते हैं ? लिखिए।
उत्तर - आसमान में तितलियों की तरह उड़ती रंग-बिरंगी पतंगों को देखकर मैं अक्सर कल्पना के संसार में खो जाता हूँ। मैं सोचता हूँ कि काश! मैं भी इन पतंगों की तरह खुले आसमान में उन्मुक्त उड़ान भर पाता। अपनी उड़ान से अनन्त आकाश की ऊँचाइयों की थाह ले पाता। पतंगों को देखकर एक और बात जो मेरे मन में आती है वह यह कि काश ! पतंगों की तरह ही मेरी जिन्दगी भी हल्की-फुल्की एवं मनोविनोदों से परिपूर्ण होती।

2. 'रोमांचित शरीर का संगीत' का जीवन की लय से क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर - 'रोमांचित शरीर का संगीत' का जीवन की लय से अद्भुत सम्बन्ध है। जब कभी भी मानव का शरीर पूर्ण मनोयोग से किसी कार्य की सिद्धि में लग जाता है तो शरीर में एक अद्भुत रोमांच और अकल्पनीय संगीत पैदा होता है। इस संगीत की लय में शरीर का रोम-रोम पुलकित हो लक्ष्य प्राप्ति हेतु दिशा विशेष में सम्मिलित प्रयास प्रारम्भ कर देता है। ऐसे में उसे किसी भी प्रकार की थकान का भी अनुभव नहीं होता है। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि 'रोमांचित शरीर का संगीत' का जीवन की लय के साथ गहरा सम्बन्ध है।

3. 'महज एक धागे के सहारे, पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ' उन्हें (बच्चों को) कैसे थाम लेती हैं ? चर्चा करें।
उत्तर - बच्चे जब खुले आसमान में पतंग उड़ाते हैं तो ऐसे में वे सब कुछ भूलकर उसी में रम जाते हैं। पतंग के अतिरिक्त उन्हें अन्य किसी भी चीज का ध्यान नहीं रहता। आकाश में ऊँचाइयों को छूती पतंग की तरह ही उनका मन-मस्तिष्क की कल्पनाओं की नई उड़ान भरने लगता है। हिचकोले खाती पतंग की तरह ही उनका मन मयूर भी प्रफुल्लित हो हिलोरें लेने लगता है। वे यन्त्रवत् हो पतंग उड़ाने में लगे रहते हैं। उनका पूरा ध्यान धागे और पतंग पर होता है। वह पतंग जिस पर एक नाजुक धागे से वे नियन्त्रण बनाये रखते हैं। पतंग पर नियन्त्रण ही। उनके अन्दर आत्मविश्वास और निडरता के भाव भरता है। ऐसे में उनके हाथ में मौजूद धागा न सिर्फ पतंग को अपितु उन बच्चों की अनगिनत कोमल भावनाओं और कल्पनाओं को भी थामे रहता है।

आपकी कविता-

1. आपके जीवन में शरद ऋतु क्या मायने रखती है ?
उत्तर - ऋतुराज शरद मुझे अत्यधिक पसन्द है। गर्मी एवं बरसात के चार-पाँच माह बाद जब यह मनभावन ऋतु आती है तो मैं अपने रुके हुए कामों को पूर्ण करता हूँ। इस ऋतु में खाने-पीने, खेलने, पढ़ने इत्यादि में खूब मन लगता है। शरद ऋतु बढ़ने पर गुनगुनी धूप अच्छी लगने लगती है। व्यक्ति की पाचन शक्ति भी बेहतर हो जाती है। अतः यह कहा जा सकता है कि मेरे जीवन में शरद ऋतु एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है।


आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
(I hope the above information will be useful and important. )
Thank you.
R. F. Tembhre
(Teacher)
rfhindi.com

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4. बानी जगरानी की उदारता बखानी जाइ― केशवदास
5. मैया, मोहिं दाऊ बहुत खिझायो― सूरदास

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. मो देखत जसुमति तेरे ढोटा, अबहिं माटी खाई― सूरदास
2. बाल्हा मैं बैरागिण हूँगी हो– मीराबाई
3. आचार्य केशवदास– कवि परिचय
4. मीराबाई– कवि परिचय
5. सखी री लाज बैरन भई– मीराबाई

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की– जगन्नाथ दास 'रत्नाकर'
2. कबीर संगति साधु की– कबीर दास
3. सुनि सुनि ऊधव की अकह कहानी कान– जगन्नाथ दास 'रत्नाकर'
4. हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास– आधुनिक काल
5. कबीर कुसंग न कीजिये– कबीरदास

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. आए हौ सिखावन कौं जोग मथुरा तैं तोपै– जगन्नाथ दास 'रत्नाकर'
2. जो पूर्व में हमको अशिक्षित या असभ्य बता रहे– मैथिलीशरण गुप्त
3. जो जल बाढ़ै नाव में– कबीरदास
4. देखो मालिन, मुझे न तोड़ो– शिवमंगल सिंह 'सुमन'
5. शब्द सम्हारे बोलिये– कबीरदास

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. छावते कुटीर कहूँ रम्य जमुना कै तीर– जगन्नाथ दास 'रत्नाकर'
2. भज मन चरण कँवल अविनासी– मीराबाई
3. हिंदी का इतिहास– भारतेन्दु युग (विशेषताएँ एवं प्रमुख कवि)
4. हिन्दी का इतिहास– द्विवेदी युग (विशेषताएँ एवं कवि)
5. मैथिलीशरण गुप्त– कवि परिचय

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. छायावाद– विशेषताएँ एवं प्रमुख कवि
2. रहस्यवाद (विशेषताएँ) तथा छायावाद व रहस्यवाद में अंतर
3. प्रगतिवाद– विशेषताएँ एवं प्रमुख कवि
4. प्रयोगवाद– विशेषताएँ एवं महत्वपूर्ण कवि
5. नई कविता– विशेषताएँ एवं प्रमुख कवि

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. गोस्वामी तुलसीदास– जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ
2. नाटक क्या है? | नाटक का इतिहास एवं प्रमुख नाटककार
3. सूरदास का जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ
4. जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ
5. एकांकी क्या है? | एकांकी का इतिहास एवं प्रमुख एकांकीकार

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' का जीवन परिचय
2. उपन्यास क्या है? | उपन्यास का इतिहास एवं प्रमुख उपन्यासकार
3. कबीर दास का जीवन परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ
4. माटी कहै कुम्हार से – कबीर दास
5. यह संसार क्षणभंगुर है – जैनेन्द्र कुमार

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।
1. यह तन काँचा कुम्भ है – कबीर दास
2. नाम अजामिल-से खल कोटि – गोस्वामी तुलसीदास
3. एहि घाटतें थोरिक दूरि अहै– गोस्वामी तुलसीदास
4. रावरे दोषु न पायन को – गोस्वामी तुलसीदास
5. प्रभुरुख पाइ कै, बोलाइ बालक घरनिहि – गोस्वामी तुलसीदास

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।
1. पत्र-साहित्य क्या है? | प्रमुख पत्र-साहित्य एवं उनके लेखक
2. निबन्ध क्या है? | निबन्ध का इतिहास || प्रमुख निबन्धकार एवं उनकी रचनाएँ
3. आत्मकथा क्या होती है? | प्रमुख आत्मकथा लेखक एवं उनकी रचनाएँ
4. संस्मरण क्या है? | प्रमुख संस्मरण लेखक एवं उनकी रचनाएँ
5. कहानी क्या होती है? | प्रमुख कहानीकार एवं उनकी कहानियाँ || उपन्यास और कहानी में अन्तर

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।
1. अर्थ के आधार पर वाक्यों के प्रकार
2. रीतिकाल की विशेषताएँ और धाराएँ | प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ
3. भक्तिकाल | सगुण धारा की रामभक्ति और कृष्णभक्ति शाखा || निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी शाखा
4. आदिकाल की विशेषताएँ | प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ
5. लघुकथा किसे कहते हैं? | प्रमुख लघुकथाकार एवं उनकी रचनाएँ

हिन्दी के इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।
1. हिन्दी गद्य विधा 'रेखाचित्र' क्या होते हैं? | संस्मरण और रेखाचित्र में अन्तर
2. वीर रस और करूण रस में अन्तर | वीर और करूण रस की परिभाषा और उदाहरण
3. महाकाव्य और खण्डकाव्य में क्या अन्तर है? | महाकाव्य और खण्डकाव्य क्या होते हैं?

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