Sharing knowledge About RF Hindi

× Home Content / Blogs (लेख) Categories Subscribe Our other websites Our Social Media Link Contact us About us Privacy Policy Disclaimer Terms and Conditions

Blog / Content Details

विषयवस्तु विवरण



व्याकरण का प्रारम्भ || आदि व्याकरण - व्याकरणाचार्य पणिनि || हिन्दी व्याकरण

  • BY:
     RF Temre
  • Posted on:
    January 01, 1970

जैसा कि हम जानते हैं किसी भी भाषा की शुद्धता और सही भाव ग्रहण करने में व्याकरण की महती भूमिका होती है। निश्चित तौर से आदिकाल से ही व्याकरण का अस्तित्व रहा है। ऐसा किवदंती है कि वेदों की रचना के पश्चात समस्त देव-गणों की प्रार्थना पर इन्द्रदेव के द्वारा व्याकरण की रचना की गई थी, जिसका नाम 'शेष' था। चूँकि यह व्याकरण अब कहीं पर भी विद्यमान नहीं है।
यदि हम इस लौकिक संसार की बात करें तो सर्वप्रथम इसमें भाषा सुधार के लिए जिन नियमावलियों के संग्रह को व्याकरण का रूप दिया उनमें सबसे पहला नाम महर्षि पणिनि का आता है।

संसार में मानव अपने भावों की अभिव्यक्ति के लिए जितनी भी भाषाओं प्रयोग आदिकाल से करता आ रहा है, चाहे वे भाषाएँ वैदिक संस्कृत हो, लौकिक संस्कृत हो या प्राकृत पालि, अपभ्रंश या फिर आधुनिक भाषाएँ हों उन सभी भाषाओं के स्वरूप की रक्षा ही व्याकरण रचना का मुख्य उद्देश्य है।

हिन्दी भाषा के इतिहास से संबंधित इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. भाषा का आदि इतिहास - भाषा उत्पत्ति एवं इसका आरंभिक स्वरूप
2. भाषा शब्द की उत्पत्ति, भाषा के रूप - मौखिक, लिखित एवं सांकेतिक
3. भाषा के विभिन्न रूप - बोली, भाषा, विभाषा, उप-भाषा
4. मानक भाषा क्या है? मानक भाषा के तत्व, शैलियाँ एवं विशेषताएँ
5. देवनागरी लिपि एवं इसका नामकरण, भारतीय लिपियाँ- सिन्धु घाटी लिपि, ब्राह्मी लिपि, खरोष्ठी लिपि
6. हिन्दू (हिन्दु) शब्द का अर्थ एवं हिन्दी शब्द की उत्पत्ति
7. व्याकरण क्या है? अर्थ एवं परिभाषा, व्याकरण के लाभ, व्याकरण के विभाग

यास्क मुनि जो कि वैदिक संज्ञाओं के एक प्रसिद्ध व्युत्पतिकार एवं वैयाकरण थे, उनके समय तक अनेक निरुक्तों और व्याकरणों की रचना हो चुकी थी। यास्क मुनि और महर्षि पाणिनि के बीच भी अनेक श्रेष्ठ व्याकरणाचार्य हुए, किन्तु न तो यास्क मुनि के पूर्व का कोई निरुक्त उपलब्ध है और न पाणिनि के पूर्व का कोई भाषा-व्याकरण उपलब्ध है। पाणिनि ने अपने ग्रन्थों में जिस प्रकार पूर्ववर्ती ग्रन्थों का उल्लेख किया है, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उसके समय तक व्याकरण के स्वरूप का विकास हो चुका था। पणिनि ने अपने ग्रंथ में 'आपिशलि' के नाम का उल्लेख किया है। पाणिनि (ई. पू. लगभग 550) के पहले कई व्याकरण लिखे जा चुके थे जिनमें केवल आपिशलि और काशकृत्स्न के कुछ सूत्र आज उपलब्ध हैं। आपिशलि तथा काशकृत्स्न को व्याकरण- सम्प्रदाय का जनक माना जाता है। पाणिनि ने अपने व्याकरण में प्रथमा, द्वितीया, षष्ठी, प्रत्यय, कृतु, तद्धित, अव्ययीभाव, बहुब्रीहि, आदि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया है, इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पाणिनि के समय तक व्याकरण का पूर्ण विकसित हो चुकी थी।

ध्वनि एवं वर्णमाला से संबंधित इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. ध्वनि का अर्थ, परिभाषा, लक्षण, महत्व, ध्वनि शिक्षण के उद्देश्य ,भाषायी ध्वनियाँ
2. वाणी - यन्त्र (मुख के अवयव) के प्रकार- ध्वनि यन्त्र (वाक्-यन्त्र) के मुख में स्थान
3. हिन्दी भाषा में स्वर और व्यन्जन || स्वर एवं व्यन्जनों के प्रकार, इनकी संख्या एवं इनमें अन्तर
4. स्वरों के वर्गीकरण के छः आधार
5. व्यन्जनों के प्रकार - प्रयत्न, स्थान, स्वरतन्त्रिय, प्राणत्व के आधार पर

महर्षि पाणिनि - महान व्याकरण प्रवर्तक

महर्षि परिणय रचित अष्टाध्यायी व्याकरण का सर्वप्रथम ग्रंथ माना जाता है। पाणिनि विश्व के सबसे बड़े एवं महान व्याकरणविद् हैं। कई विदेशी व्याकरणाचार्य एवं भाषा-विदों ने भी उनकी प्रशंसा अपने ग्रन्थों में की है। इन्हीं में से एक आधुनिक भाषा-विज्ञान के जनक कहे जाने वाले Leonard Bloomfield ने अपनी पुस्तक 'Language' में पणिनि कृत 'अष्टाध्यायी' की अपने मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए लिखा है- "यह व्याकरण जो लगभग 350 ई.पू. के आसपास की है। 250 ई.पू. मानव बुद्धि के सबसे महान स्मारकों में से एक है... "आज कोई अन्य भाषा नहीं है जिसमें इतना सटीक वर्णन किया गया है।"

महर्षि पणिनि रचित 'अष्टाध्यायी' के अतिरिक्त पाणिनि ने अपने अन्य तीन ग्रन्थ - 'धातुपाठ', 'गणपाठ' एवं 'उणादि-सूत्र' की रचना की। महर्षि पाणिनि द्वारा रचित 'अष्टाध्यायी' 2500 वर्ष बाद आज भी महत्व है। मानक हिन्दी भाषा की पारिभाषिक शब्दावली के लिए इसी व्याकरण को आधार माना जाता है।

ध्वनि, वर्णमाला एवं भाषा से संबंधित इन 👇 प्रकरणों को भी पढ़िए।।
1. 'अ' से 'औ' तक हिन्दी स्वरों की विशेषताएँ एवं मुख में उच्चारण स्थिति
2. प्रमुख 22 ध्वनि यन्त्र- स्वर तन्त्रियों के मुख्य कार्य
3. मात्रा किसे कहते हैं? हिन्दी स्वरों की मात्राएँ, ऑ ध्वनि, अनुस्वार, अनुनासिक, विसर्ग एवं हलन्त के चिह्न
4. वर्ण संयोग के नियम- व्यन्जन से व्यन्जन का संयोग
5. बलाघात या स्वराघात क्या है इसकी आवश्यकता, बलाघात के भेद
7. ध्वनि उच्चारण में 'प्रत्यन' क्या है? प्रयत्नों की संख्या, 'प्रयत्न' के आधार पर हिन्दी व्यन्जन के भेद


संबंधित जानकारी के लिए नीचे दिये गए विडियो को देखें।👇🏻
(Watch video for related information)

आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
(I hope the above information will be useful and important. )
Thank you.
R. F. Tembhre
(Teacher)
rfhindi.com

RF Hindi Membership सब्सक्राइब करें

6 + 9 = ?

Note: महत्वपूर्ण अपडेट्स सीधे अपने ईमेल पर पाएं।

Comments (0)

अभी तक कोई कमेंट नहीं है। पहला कमेंट आप करें!

Leave a Reply

Security Check: 9 + 6 = ?
  • Share on :

You may also like

Follow us

Catagories

subscribe

Note― अपनी ईमेल id टाइप कर ही सब्सक्राइब करें।