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पाठ - 14 'चंद्र गहना से लौटती बेर' (विषय - हिन्दी काव्य-खण्ड कक्षा- 9) सारांश, भावार्थ एवं प्रश्नोत्तर || Path 6 'Chandra Gehna se Loutati Ber'

  • BY:
     RF Temre
  • Posted on:
    January 01, 1970

भाव (सारांश)

कवि केदारनाथ चंद्र गहना देखकर लौट रहे थे कि फसलों और वनस्पतियों के प्राकृतिक सौंदर्य में उलझकर वे खेत की मेंड़ पर बैठ गए। उनके ठीक सामने एक छोटा चने का पौधा है जिसने गुलाबी फूल की पगड़ी बाँध रखी है उसी से सटकर अलसी खड़ी है। पीली-पीली सरसों भी सयानी हो गई है। इन सभी का एकत्रित होना कवि को स्वयंवर का आभास देता है। खेत के नीचे की तरफ पोखर में भूरे रंग की घास लहरें ले रही है, पानी में एक चाँदी का सा खम्भा चमचमा रहा है। किनारे पर पत्थर पड़े हैं। पानी में खड़ा बगुला मौका लगते ही मछली को मुँह में दबा लेता है। काले माथे वाली एक चिड़िया अपनी चोंच में एक मछली को दबाकर भाग जाती है। जब कवि ऊपर देखते हैं तो रेल की खाली पटरी दिखती है। चारों तरफ छोटी-छोटी पहाड़ियाँ दिख रही हैं जिन पर काँटेदार बबूल खड़े हैं। तोता और सारस के मधुर स्वर सुनाई पड़ रहे हैं। उड़कर जाते सारस को देखकर कवि का मन होता है कि उसी के साथ उड़ जाऊँ और उसकी जोड़ी के पास जाकर चुपचाप उनकी सच्ची प्रेंम कहानी सुन लूँ।

लेखक परिचय-
केदारनाथ अग्रवाल

केदारनाथ अग्रवाल का जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के कमासिन गाँव में सन् 1911 में हुआ। उनकी शिक्षा इलाहाबाद और आगरा विश्वविद्यालय से हुई। केदारनाथ अग्रवाल पेशे से वकील रहे हैं। उनका तत्कालीन साहित्यिक आंदोलनों से गहरा जुड़ाव रहा है। सन् 2000 में उनका देहांत हो गया।

नींद के बादल, युग की गंगा, फूल नहीं रंग बोलते हैं, आग का आईना, पंख और पतवार, हे मेरी तुम, मार प्यार की थायें और कहे केदार खरी-खरी उनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं। उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिवादी धारा के प्रमुख कवि माने जाते हैं। जनसामान्य का संघर्ष और प्रकृति सौंदर्य उनकी कविताओं का मुख्य प्रतिपाद्य है। उनके यहाँ प्रकृति का यथार्थवादी रूप व्यक्त हुआ है जिसमें शब्दों का सौंदर्य हैं, ध्वनियों की धारा है और स्थापत्य की कला है। संगीतात्मकता उनके काव्य की एक अन्यतम विशेषता है। बुंदेलखंडी समाज का दैनंदिन जीवन अपने खुलेपन और उमंग के साथ उनके काव्य में अभिव्यक्त हुआ है। केदार कविता की भाषा को लोकभाषा के निकट लाते हैं और ग्रामीण जीवन से जुड़े बिम्बों को आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करते हैं।

महत्वपूर्ण पद्यांशों की व्याख्या

पद्यांश (1) देख आया चंद्र गहना।
देखता हूँ दृश्य अब मैं,
मेड़ पर इस खेत की बैठा अकेला।
एक बीते के बराबर
यह हरा ठिगना चना,
बाँधे मुरैठा शीश पर
छोटे गुलाबी फूल का,
सजकर खड़ा है।
पास ही मिल कर उगी है
बीच में अलसी हठीली
देह की पतली, कमर की है लचीली,
नील फूले फूल को सिर पर चढ़ाकर
कह रही है जो छुए यह
दूँ हृदय का दान उसको।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'चंद्र गहना से लौटती बेर' पाठ से लिया गया है। इसके कवि केदारनाथ अग्रवाल हैं।

प्रसंग - इसमें कवि ने चंद्र गहना से लौटते समय जो खेतों में अनोखे दृश्य देखे, उनका चित्रण किया है।

व्याख्या - कवि चंद्र गहना देखकर लौट रहे थे तो उन्हें मार्ग में खेतों में अदभुत दृश्य दिखाई दिए। वे खेत की मेड़ पर बैठ गए। उनकी नजर एक बालिस्त के ठिगने से चने के पौधे पर गई जो गुलाबी रंग की पगड़ी पहनकर सज-धज कर खड़ा हुआ हुआ था। उसके पास ही जिद्दी स्वभाव की दुबली-पतली कमर वाली अलसी खड़ी है। उसने नीले खिले हुए फूल को अपने सिर पर लगा रखा है। ऐसा लगता है जैसे वह घोषणा कर रही है कि जो भी मेरे सिर के फूल को छू लेगा, उसे ही मैं अपने प्रेंम का पात्र बना लूँगी। मैं उससे ही विवाह कर लूँगी।

विशेष - (1) प्राकृतिक सौंदर्य का भावात्मक अंकन हुआ है। प्रकृति की गतिविधियाँ मानवोचित हैं।
(2) सरल, सुबोध खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
(3) अनुप्रास, मानवीकरण अलंकारों का सौंदर्य दर्शनीय।

पद्यांश (2) और सरसों की न पूछो
हो गई सबसे सयानी,
हाथ पीले कर लिये हैं
व्याह- मंडप में पधारी
फाग गाता मास फागुन
आ गया है आज जैसे।
देखता हूँ मैं : स्वयंवर हो रहा है,
प्रकृति का अनुराग– अंचल हिल रहा है
इस विजन में
दूर व्यापारिक नगर से
प्रेम की प्रिय भूमि उपजाऊ अधिक है।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'चंद्र गहना से लौटती बेर' पाठ से लिया गया है। इसके कवि केदारनाथ अग्रवाल हैं।

प्रसंग - यहाँ वनस्पतियों के मिलन को स्वयंवर जैसा वर्णित किया गया। विभिन्न वनस्पतियों में प्रेंम भाव भरा है।

व्याख्या - कवि कहते हैं कि सरसों की बात मत करो वह चना, अलसी आदि से बड़ी हो गई है। उसने अपने हाथ पीले कर लिए हैं और विवाह के मण्डप में आकर बैठ गई है। ऐसा लग रहा है जैसे आज फाग गाता हुआ फागुन का महीना आ गया है। कन्या, वर, गीत आदि को देखकर कवि को ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे प्रकृति का स्वयंवर हो रहा है। प्रकृति का प्रेमांचल उद्वेलित होता हुआ लग रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि व्यापारिक गतिविधियों के केन्द्र नगरों से दूर ये एकांत निर्जन प्राकृतिक प्रदेश प्रेंम की बहुत अधिक उपजाऊ भूमि है अर्थात् इस एकांत निर्जन में प्रेंम व्यापार अधिकाधिक मात्रा में चल रहे हैं।

विशेष - (1) प्रकृति प्रेंम के मानवोचित व्यापारों का चित्रण हुआ है।
(2) सहज, स्वाभाविक भाषा में मार्मिक अभिव्यंजना की गई है।
(3) मानवीकरण, अनुप्रास अलंकारों की छटा दर्शनीय है।

पद्यांश (3) और पैरों के तले है एक पोखर,
उठ रहीं उसमें लहरियाँ,
नील तल में जो उगी है घास भूरी
ले रही वह भी लहरियाँ।
एक चाँदी का बड़ा-सा गोल खम्भा
आँख को है चकमकाता।
हैं कई पत्थर किनारे
पी रहे चुपचाप पानी,
प्यास जाने कब बुझेगी।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'चंद्र गहना से लौटती बेर' पाठ से लिया गया है। इसके कवि केदारनाथ अग्रवाल हैं।

प्रसंग - इसमें पोखर के दृश्य का चित्रण किया गया है।

व्याख्या - कवि कहते है कि मेरे पैरों के नीचे एक छोटा सा तालाब है। उस तालाब के पानी में जो लहरें उठ रही हैं उनके साथ ही तालाब के नीले तले में उगने वाली भूरी घास भी लहर ले रही है। तालाब के पानी में पड़ते सूर्य के प्रतिबिम्ब का चाँदी का एक बड़ा सा गोल खम्भा है जो आँखों में चकाचौंध पैदा कर रहा है। उस तालाब के किनारे पर कई पत्थर पड़े हैं जो चुपचाप तालाब का पानी पी रहे हैं। पता नहीं उनकी प्यास कब शान्त होगी।

विशेष - (1) यहाँ पोखर के पानी की लहरों, भूरी घास, चाँदी के खम्भे का मनोहारी चित्रण हुआ है।
(2) सरल, सुबोध, व्यावहारिक भाषा का प्रयोग हुआ है।
(3) अनुप्रास एवं मानवीकरण अलंकार का सौंदर्य अवलोकनीय है।

पद्यांश (4) चुप खड़ा बगुला डुबाए टाँग जल में,
देखते ही मीन चंचल
ध्यान निद्रा त्यागता है,
चट दबाकर चोंच में
नीचे गले के डालता है।
एक काले माथ वाली चतुर चिड़िया
श्वेत पंखों के झपाटे मार फौरन
टूट पड़ती भरे जल के हृदय पर,
एक उजली चटुल मछली
चोंच पीली में दबाकर
दूर उड़ती है गगन में।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'चंद्र गहना से लौटती बेर' पाठ से लिया गया है। इसके कवि केदारनाथ अग्रवाल हैं।

प्रसंग - प्रस्तुत पंद्याश में एक छोटे तालाब की गतिविधि के बारे में बताया गया है।

व्याख्या - कवि कहते हैं कि एक बगुला अपनी टांगें पोखर के पानी में डुबोकर चुपचाप खड़ा हुआ है। चंचल मछली को देखते ही, वह ध्यान की नींद त्यागकर तुरंत उस मछली को अपनी चोंच में दबाकर गले के नीचे उतार लेता है। तब ही एक काले मस्तक वाली चालाक चिड़िया अपने सफेद पंखों से झपट्टा मारकर पानी के मध्य कूद पड़ती है और एक चंचल मछली को अपनी चोंच में दबाकर आकाश में उड़ी जा रही है।

विशेष - (1) तालाब में मछली का शिकार करने वाले बगुला तथा चिड़ियों के कौशल का अंकन हुआ है।
(2) सहज, स्वाभाविक भाषा में विषय को प्रस्तुत किया गया है।
(3) अनुप्रास अलंकार।

पद्यांश (5) सुन पड़ता है
मीठा-मीठा रस टपकाता
सुग्गे का स्वर
टें टें टें टें;
सुन पड़ता है
वनस्थली का हृदय चीरता
उठता गिरता
सारस का स्वर
टिरटों टिरटों,
मन होता है-
उड़ जाऊँ मैं
पर फैलाए सारस के संग
जहाँ जुगुल जोड़ी रहती है
हरे खेत में,
सच्ची प्रेंम-कहानी सुन लूँ
चुप्पे-चुप्पे।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'चंद्र गहना से लौटती बेर' पाठ से लिया गया है। इसके कवि केदारनाथ अग्रवाल हैं।

प्रसंग - इसमें तोते तथा सारस के मधुर स्वर का अंकन हुआ है तथा कवि की सारस जोड़ी की प्रेंम कहानी सुनने की लालसा अंकित है।

व्याख्या - कवि कहते हैं कि अचानक तोते का मीठा-मीठा रस टपकाता हुआ स्वर सुनाई पड़ता है जो टें टें की मधुर ध्वनि कर रहा है। तब ही जंगल के हृदय को चीरता हुआ सारस का उठता-गिरता स्वर सुनाई पड़ जाता है जो टिरटों, टिरटों की ध्वनि कर रहा है। उस मधुर स्वर को सुनकर मेरी इच्छा होती है कि मैं पंख फैलाकर सारस के साथ आकाश में उड़ जाऊँ और सारस की जोड़ी जिस खेत में रहती है वहाँ जाकर उनकी सच्ची प्रेम कहानी को चुपके से सुन लूँ।

विशेष - (1) यहाँ तोते तथा सारस के स्वर माधुर्य की प्रभावशीलता तथा कवि की सारस जोड़ी की सच्ची प्रेम कहानी चुनने की इच्छा प्रकट हुई है।
(2) सरल, सुबोध, व्यावहारिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।
(3) पुनरुक्तिप्रकाश एवं अनुप्रास अलंकारों का सौंदर्य दर्शनीय है।

प्रश्न अभ्यास-

प्रश्न 1. 'इस विजन में........अधिक है'- पंक्तियों में नगरीय संस्कृति के प्रति कवि का क्या आक्रोश है और क्यों।
उत्तर - इन पंक्तियों में नगर की स्वार्थपरता तथा व्यापारिक वृत्ति के प्रति आक्रोश है। नगर में प्रत्येक कार्य लाभ-हानि के आधार पर होता है। वहाँ सहज, स्वाभाविक व्यवहार नहीं होते हैं। जबकि एकांत निर्जन में निश्छल, निष्कपट प्रेंम भाव विकसित होता है। सहज, स्वाभाविक प्रेंम में किसी प्रकार के लाभ-हानि का हिसाब नहीं किया जाता है। नगर में तो प्रेंम सम्बन्धों में भी स्वार्थपरता, हानि-लाभ का विचार किया जाता है। इसलिए कवि को व्यापारिक वृत्ति के प्रति आक्रोश है क्योंकि उसमें स्वाभाविकता एवं सहजता का अभाव होता है।

प्रश्न 2. सरसों को 'सयानी' कह कर कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर - यहाँ सयानी शब्द के दो अर्थ हैं- (1) बड़ी उम्र की, (2) चतुर चालाक। फसलों में विचार करें तो सरसों में दोनों बातें मिलती हैं। वह चना आदि से पहले बोई जाती तो वह उम्र में भी बड़ी होती है। साथ ही वह चना आदि से पहले ही पककर बाजार में पहुँच जाती है। इसलिए सरसों को सयानी कहा है। कवि कहना चाहता है कि सरसों को जल्दी रहती है इसीलिए अन्य फसलों से पहले पक जाती है, कट जाती है और बाजार में पहुँच जाती है।

प्रश्न 3. अलसी के मनोभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर - अलसी का स्वभाव जिद्दी है वह किसी का लिहाज नहीं करती है। उसे सजने, संवरने का शौक है। शरीर की दुबली-पतली है, उसकी कमर लचकदार है। उसने अपने सिर पर नीला फूल लगाया हुआ है। वह रूप गर्विता है। उसे स्वयं पर विश्वास है इसीलिए वह चुनौती देती है कि जो मेरे सिर के फूल को छू लेगा उसे ही अपने हृदय का प्रेम प्रदान करेगी।

प्रश्न 4. अलसी के लिए 'हठीली' विशेषण क्यों प्रयोग किया है?
उत्तर - अलसी के लिए 'हठीली' विशेषण इसलिए प्रयोग किया है क्योंकि वह किसी का लिहाज नहीं करती है। यहाँ तक कि जिस चने के सहारे वह बड़ी हुई, खड़ी है उसकी चिंता किए बिना स्वयं ही स्वयंवर की घोषणा कर देती है। उसमें चने के प्रति कोई लगाव नहीं है। वह उसका ख्याल किए बिना अपना स्वयंवर रचा रही है।

प्रश्न 5. 'चाँदी का बड़ा-सा गोल खम्भा' में कवि की किस सूक्ष्म कल्पना का आभास मिलता है?
उत्तर - पोखर के पानी में दिखाई दे रहा सूर्य का प्रतिबिम्ब ही चाँदी का सा गोल खम्भा है। सूर्य के प्रतिबिम्ब की प्रतिछाया से निकलने वाली तेज चमक से ही आँख चकमकाती हैं। कवि की यही सूक्ष्म कल्पना है।

प्रश्न 6. कविता के आधार पर 'हरे चने' का सौंदर्य अपने शब्दों में चिह्नित कीजिए।
उत्तर - हरा चना भले ही ठिगना है किन्तु उसका शरीर गठीला है। उसने सिर पर गुलाबी रंग के फूल की पगड़ी बँधी है। वह अच्छी तरह सज-सँवर कर खड़ा हुआ है। वह देखने में आकर्षक है। यही कारण है कि कवि का ध्यान सबसे पहले उसकी ओर जाता है। सम्भवतः कवि ने प्रकृति के स्वयंवर की कल्पना भी चने, अलसी, सरसों के कारण की है।

प्रश्न 7. कवि ने प्रकृति का मानवीकरण कहाँ-कहाँ किया है?
उत्तर - कवि ने कई पंक्तियों में प्रकृति का मानवीकरण किया है-
(i) यह हरा ठिगना चना
बाँधे मुरैठा शीश पर,
इसमें हरे चने के पौधे के कद, पगड़ी आदि में मानवीकरण हुआ है।
(ii) पास ही मिलकर उगी है बीच में अलसी हठीली
देह की पतली कमर की है लचीली, नील फूले फूल को सिर पर चढ़ा कर
कर रही है, जो छुए यह दूँ हृदय का दान उसको-
यहाँ अलसी में मानवोचित क्रियाओं को दिखाया गया है।
(iii) और सरसों की न पूछछे हो गई सबसे सयानी
हाथ पीले कर लिए हैं व्याह मण्डप में पधारी
यहाँ सरसों को नायिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो विवाह मण्डप में बैठी है।
(iv) फाग गाता मास फागुन आ गया है आज जैसे । इसमें फागुन के माह का मानवीकरण हुआ है।
(v) हैं कई पत्थर किनारे पी रहे चुपचाप पानी इसमें पत्थर मानवोचित क्रिया कर रहे हैं।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 8. 'और सरसों की न पूछो' इस उक्ति में बात को कहने का एक खास अंदाज है। हम इस प्रकार की शैली का प्रयोग कब और क्यों करते हैं?
उत्तर - इस शैली का प्रयोग विशेष अर्थ व्यक्त करने को करते हैं। इस शैली से ध्यान आकर्षित होता है तथा रोचकता आती है। इस शैली का प्रयोग इसलिए भी करते हैं जिससे बात को सुनने की उत्सुकता हो।

प्रश्न 9. काले माथे और सफेद पंखों वाली चिड़िया आपकी दृष्टि में किस प्रकार के व्यक्तित्व का प्रतीक हो सकती है?
उत्तर - काले माथे तथा सफेद पंखों वाली चिड़िया दोहरे व्यक्तित्व का प्रतीक हो सकती है। नीच कार्य करने वाले सफेदपोश इसी प्रकार के होते हैं। दिखने में ये भले लगते हैं परन्तु मौका मिलते ही ये प्रहार करने में संकोच नहीं करते हैं।

भाषा अध्ययन

प्रश्न 10. बीते के बराबर, ठिगना, मुरैठा आदि सामान्य बोलचाल के शब्द हैं, लेकिन कविता में इन्हीं से सौंदर्य उभरा है और कविता सहज बन पड़ी है। कविता में आए ऐसे ही अन्य शब्दों की सूची बनाइए।
उत्तर - कविता में आए सामान्य बोलचाल के शब्द हैं- छूए, सयानी, ब्याह, चट, माथ, अनगढ़, बाँझ, सुग्गे, जुगुल, चुप्पे-चुप्पे ।

प्रश्न 11. कविता को पढ़ते समय कुछ मुहावरे मानस पटल पर उभर आते हैं, उन्हें लिखिए और अपने वाक्यों में प्रयुक्त कीजिए।
उत्तर - उत्तर—कविता पढ़ते समय उभरने वाले कुछ मुहावरे वाक्य प्रयोग सहित दिए जा रहे हैं-
(1) एक बीते के बराबर- (छोटा, ठिगना) मोहन का छोटा भाई एक बीते के बराबर है।
(2) हठीली होना- (जिद्दी स्वभाव) राम की पत्नी बहुत हठीली है।
(3) छू मन्तर होना- (गायब होना) वह अपना काम निकालते ही छू मन्तर हो गया।
(4) आँख चौंधियाना- (चकमका देना) हीरे की चमक से आँख चौंधिया जाती हैं।
(5) बगुला भगत- (बनावटी स्वभाव वाला) आज के अधिकांश नेता बगुला भगत सिद्ध हो रहे हैं।
(6) झपट्टा मारना- (तुरन्त ले लेना) कुछ लोग झपट्टा मारने में कुशल होते हैं।
(7) टूट पड़ना- (तेज आक्रमण करना) भारतीय सेना शत्रु सेना पर टूट पड़ने में कुशल है।

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3. पाठ 3 'सवैये' भावार्थ एवं प्रश्नोत्तर
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1. पाठ 1 'दो बैलों की कथा' पाठ, का सारांश, अभ्यास एवं व्याकरण
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4. 'ल्हासा की ओर' - यात्रावृत्त - राहुल सांकृत्यायन
5. पाठ- 2 'ल्हासा की ओर' (यात्रा-वृत्तान्त, लेखक- राहुल सांकृत्यायन), पाठ का सारांश, प्रश्नोत्तर, भाषा अध्ययन, रचना और अभिव्यक्ति (कक्षा 9 हिन्दी)

कक्षा 9 संस्कृत के पाठों व प्रश्नोत्तर पढ़ें।
1. पाठः प्रथमः 'भारतीवसन्तगीतिः' (विषय - संस्कृत कक्षा- 9) सारांश, भावार्थ एवं प्रश्नोत्तर
2. पाठः द्वितीयः 'स्वर्णकाकः' (विषय - संस्कृत कक्षा- 9) सारांश, भावार्थ एवं प्रश्नोत्तर
3. पाठः तृतीयः 'गोदोहनम्' विषय - संस्कृत (कक्षा- 9) सारांश, भावार्थ एवं प्रश्नोत्तर


आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
(I hope the above information will be useful and important. )
Thank you.
R. F. Tembhre
(Teacher)
rfhindi.com

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